आज बहुत साल बाद मुझे अपने ब्लॉग की याद आई। बीते सालों में जिंदगी में इतने घटनाक्रम गुजरे हैं कि दूसरी बातों का कुछ ख़याल ही नहीं रहा। आज याद आई तो लगा ब्लॉग ही अपना सच्चा साथी है, जहां मन की बात तो कर सकते हैं ना। इन बीते सालों ने जितना लिया है उससे ज्यादा दिया भी है। इसलिए अच्छे-बुरे दिनों की संज्ञा दी जा सकती है।
इन सालों ने महसूस करवाया कि एक व्यक्ति का अपाहिज होना, जितना उस व्यक्ति को तकलीफ देता है उससे कहीं ज्यादा उसके आस-पास रहने वाले व्यक्तियों को झेलना पड़ता है। अपाहिज व्यक्ति चीजों को तोड़-फोड़ कर, चिल्लाकर और दूसरों को प्रताड़ित करके अपने अंदर के गुस्से के गुब्बार को निकाल देता है। उसके आस-पास के व्यक्तियों को ये सब करना नासमझ ही साबित करता है।
जीवन साथी का अपाहिज होना, गम में राहत और सहारा देने वाली सास माँ का असमय ही दुनिया से विदा हो जाना ये दो बड़े झटके जीवन के थे। ईश्वर ने इन झटकों के बीच एक प्यारी बेटी दी और हमारी दुनिया में एक अलग ही बहार आ गई। सब गम छूमंतर हो गए।
भले भी दिन आते जगत में बुरे भी दिन आते
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