Popular Posts

Thursday, September 24, 2020

 आज बहुत साल बाद मुझे अपने ब्लॉग की याद आई। बीते सालों में जिंदगी में इतने घटनाक्रम गुजरे हैं कि दूसरी  बातों का कुछ ख़याल ही नहीं रहा। आज याद आई तो लगा ब्लॉग ही अपना सच्चा साथी है, जहां मन की बात तो कर सकते हैं ना। इन बीते सालों ने जितना लिया है उससे ज्यादा दिया भी है। इसलिए अच्छे-बुरे दिनों की संज्ञा दी जा सकती है। 

इन सालों ने महसूस करवाया कि एक व्यक्ति का अपाहिज होना, जितना उस व्यक्ति को  तकलीफ देता है उससे कहीं ज्यादा उसके आस-पास रहने वाले व्यक्तियों को झेलना पड़ता है। अपाहिज व्यक्ति चीजों को तोड़-फोड़ कर, चिल्लाकर और दूसरों को प्रताड़ित करके अपने अंदर के गुस्से के गुब्बार को निकाल देता है।  उसके आस-पास के व्यक्तियों को ये सब करना नासमझ ही साबित करता है। 

जीवन साथी का अपाहिज होना,  गम में राहत और  सहारा देने वाली सास माँ का असमय ही दुनिया से विदा हो जाना ये दो बड़े झटके जीवन के थे। ईश्वर ने इन झटकों के बीच एक प्यारी बेटी दी और हमारी दुनिया में एक अलग ही बहार आ गई। सब गम छूमंतर हो गए। 

भले भी दिन आते जगत में बुरे भी दिन आते      

 

घोंसला

पिछले साल किचन की चिमनी खराब हो गई थी। किचन में चिमनी लगाए हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था iइसलिए सोचा कंपनी ने ही चिमनी खराब दी है। चिमनी ठीक करने के लिए एक मिस्त्री को बुलाया  उसने बताया- मोटर खराब हो गई है, बदलवानी पड़ेगी। खर्चा भी अधिक  बता रहा था। ज्यादा खर्चे के कारण  ठीक करवाने का आइडिया ड्रॉप कर दिया। कुछ दिन बाद फ्रिज ठीक करने आए मिस्त्री को लगे हाथ चिमनी भी दिखाई। उसने भी मोटर खराब बताई लेकिन उसने कहा- वह उसे ठीक कर सकता है।  उसने अपनी फीस भी कम बताई तो तुरंत उसे ठीक करने का ठेका दे दिया। उसने थोड़ा समय लगाकर आखिर  ठीक भी कर दिया। मिस्त्री ने बताया- कि चिमनी के पाइप में चिड़ियाँ ने अपना घोंसला बना लिया था। घोंसले के  तिनके मोटर में फंस गए थे। इस कारण से मोटर जाम हो गई।

दरअसल चिमनी का पाइप बालकनी की तरफ खुलता है। इस तरफ मेरा कभी ध्यान ही नहीं गया था कि चिड़िया वहाँ घोंसला भी बना सकती है।  यदि समय रहते पाइप के छेद को जाली से कवर्ड कर दिया जाता तो मोटर खराब नहीं हुई होती। समय आने पर पक्षी अपने लिए घर तो तलाशते हैं ही।  चिड़ियों  को  चिमनी का रास्ता ही सबसे अच्छी जगह लगी होगी।  तिनका-तिनका जोड़कर उन्होने अपना घर तो बना  लिया था लेकिन  मोटर तिनकों के कारण जाम हो गई थी।

पिछली बार की भाँति इस बार भी चिड़ियों ने इसी जगह को चुना। इस बार चिड़ियों के घोंसला बनाने से पहले जाली तो लगा दी थी लेकिन ठीक से नहीं लग पाई थी। पाइप के छेद का थोड़ा सा हिस्सा ढकने से रह गया था। चिड़ियों के लिए तो खुल्ला हुआ उतना सा हिस्सा ही काफी था। इस बार मैंने भी सोच लिया था कि घोंसला नहीं बनाने दूँगी।  दुबारा मोटर खराब ना हो इसलिए चिड़ियों द्वारा लाए गए तिनकों को बार-बार हटाती रही। चिड़ियों को कई बार भगाया भी। मैंने जुगत करके पाइप के छेद को ठीक से बंद करने का प्रयास किया लेकिन मुझसे ज्यादा मेहनत तो चिड़िया कर रही थीं।  चिड़ियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वे बार बार जाली से रास्ता बना ही लेती थीं। उनका घोंसला हटाना मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन मेरी भी मजबूरी थी। चिड़िया की मेहनत खराब करने से मुझे अब किसी का घर तोड़ने का सा  अपराध बोध  होने लगा था। 

नर और मादा दोनों चिड़िया दिन में कई बार तिनका लाती। जाली लगने  के कारण तिनका रखने  की जगह नहीं मिल रही थी। उनके तिनके नीचे जमीन पर ही गिर जाते। अब वे दोनों मेरी रसोई की खिड़की पर बैठकर चीं-चीं करने लगी थीं। चिड़िया के अन्य  दोस्तों ने भी उनकी ची ची में साथ देना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था।  अब वे सब मिलकर चीं-चीं की आवाज से चिड़ चिड़ाने लगे थे। ऐसा नहीं था कि पहले कभी वे साथ-साथ चीं-चीं नहीं करते थे। करते थे जब कभी दाना देने में देरी हो जाती थी तब। मुझे याद दिलाने के लिए भी सभी मिलकर चिचियाते थे। खाना खाकर चुप भी हो जाती थीं। सुबह शाम की चीं-चीं तो मैं जानती लेकिन ये बेवक्त का चिचियाना!  मैं यह भी सोचती कि चिड़ियाँ क्या गलत कर रही हैं, अपना घर ही तो बना रही हैं। रोटी के साथ मकान भी तो चाहिए। मैं उनके लिए विलेन बन रही थी। मैं ही उनका मकान नहीं बनने दे रही। मेरा मन भी बैचेन होने लगा था। कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मैं सोचने लगी यदि चिड़िया की जगह मैंने इन्सानों का घर तोड़ा होता तो शायद लड़ाई हो जाती, गालियाँ पड़ती, हो सकता है केस भी हो जाता। अब कहीं अंदर से आवाज आने लगी थी कि तुम गलत कर रही हो।

दिनभर दिमाग में एक ही बात घूमती रहती कि  चिड़ियाँ के लिए क्या करूँ? ऐसा क्या करूँ कि दोनों की समस्या हल हो जाए। चिमनी भी खराब नहीं हो और चिड़िया का घोंसला भी बन जाए। घोंसला बनने बिगड़ने के बीच ही मेरी बेटी का बर्थडे आया। बर्थडे में केक कटा। केक चिड़ियों ने भी खाया। शायद उन्होने बेटी को विश भी किया हो। केक का खाली डिब्बा फ़ैकने के लिए एक तरफ रख दिया था।  दूसरे दिन कचरे की गाड़ी में फ़ैकने के लिए डिब्बा उठाया तो सहसा एक विचार मन में आया। क्यों ना इसी को चिड़िया का घर बना दिया जाए। तुरंत मैंने डिब्बे में चिड़िया के घुसने के लिए एक गोल दरवाजा बनाया और डिब्बे रूपी घोंसले को किचन के पास ही बांध दिया। अब मैं इंतजार करने लगी कि चिड़ियों की नजर उस पर पड़े। बार-बार बाहर आकर देखती। तिनका कहाँ ले जा रही है? चिड़िया डिब्बे रूपी घर को अपनाती है या नहीं? ये देखने में ही पूरा दिन निकल जाता। घर वाले भी इस काम में लग गए थे।   

लगभग दो दिन तक चिड़ियों का वही क्रम चलता रहा। मैं अपने हाथ के इशारे से और अपनी भाषा से  उनको वहाँ जाने के लिए भी कहती लेकिन वो डर कर फुर्र से उड़ जाती। तिनका लाकर चिचियाना जारी था। तीसरे दिन मैंने देखा डिब्बे का एक हिस्सा खुला है। मैंने सोचा  हवा के कारण डिब्बा खुल गया होगा। अब चिड़ियाँ घोंसला कैसे बनाएगी?  यह देखकर मन दुखी हो गया। डिब्बे से मेरी नजर नहीं हट रही थी। सहसा मुझे डिब्बे के खुले हिस्से में कुछ घास के तिनके नजर आए। तिनके नजर आने का मतलब चिड़िया इसमें गई हैं। उन तिनकों को देखकर मुझे इतनी खुशी हुई जितनी मेरा घर बनने पर भी नहीं हुई थी। डिब्बे रूपी घर को चिड़ियों ने अपना लिया था। ऐसा लगा जैसे बहुत बड़ा बोझ मन से उतर गया हो।

दिनों-दिन तिनकों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इस दौरान ही एक दिन अचानक बरसात आ गई। मुझे घोंसले का ही खयाल आया। उसके ऊपर तो कोई दीवार ही नहीं थी। गत्ते का डिब्बा है तो पानी में तो गल ही जाएगा। घोंसले को बचाने के लिए दिमाग दौड़ाने लगी। आटे के खाली प्लास्टिक के बैग का ध्यान आया। जुगाड़ करके घोंसले के ऊपर प्लास्टिक का बैग बांध दिया। दो-चार दिन बाद तेज अंधड़ आ गया तो डिब्बा अपनी जगह से हिल गया और हवा में झूलने लगा। अब फिर घोंसले की चिंता होने लगी। मैं उसे ठीक करने के लिए गई। घोंसले के हाथ लगाते हुए शायद दोनों चिड़ियों ने मुझे देख लिया था। वे ज़ोर ज़ोर से चिचियाने लगी। मेरे अगल-बगल उड़ने लगी। मैंने जल्दी से डिब्बा ठीक किया और तुरंत वहाँ से हट गई। उनकी बैचेनी और घबराहट से मैं समझ गई घोंसले में अंडे आ गए हैं। मुझे खुशी वाली गुदगुदी होने लगी। घर में सबको यह खुशखबरी सुनाई जैसे हमारे ही घर में नने-मुन्ने आने वाले हों।

दिन बितने के साथ घोंसले में से छोटे बच्चों की चीं-चीं सुनाई देने लगी थी। अपनी चीं चीं से सुबह जल्दी जगाने का काम चिड़ियों कर ही रही थी। वे बालकनी में चीं चीं करने लगती है तो मैं समझ जाती हूँ कि उनका खाने का समय हो गया है। रोटी, चावल दलिया सभी तरह का खाना उन्हें पसंद है।  गेंहु उन्हें ज्यादा पसंद नहीं आते हैं। कई बार उनकी रोटी को कुत्ते चट भी कर जाते हैं। इसलिए वे वापस खाना लेने के लिए आवाज लगाने लगती हैं।

एक दिन घोंसले में से एक बच्चा बालकनी में आ गिरा।  शायद अपने माता-पिता के इंतजार में वह गेट तक चला आया हो और गिर पड़ा हो। वह बहुत डरा हुआ था। घोंसले से निकलकर उसने पहली बार किसी दूसरे प्राणी को देखा था। उसके छोटे-छोटे कोमल से पंख थे लेकिन उड़ नहीं सकता था। छोटी सी चोंच थी लेकिन दाना पानी अपने आप नहीं ले सकता था। यदि वह बालकनी में रहता तो उसकी जान को खतरा था। उसको पकड़ना चाहा तो फुदककर इधर उधर भागने लगा। समझ में नहीं आ रहा था कैसे उसे अपने वश में करें। अब तक चिड़िया को भी शायद मालूम चल गया था। वे खिड़की पर बैठकर चिचियाने लगी। आज उनकी आवाज कुछ अलग थी। बच्चे की सुरक्षा के कारण आदमी जात पर कैसे विश्वास कर सकती थीं। बाकी घर के लोग भी परेशान और दुखी। एक रुमाल लेकर मैं उसके पास गई। धीरे से उसे पकड़ा और रुमाल से ढका। चिड़ियाएं लगातार मेरी ये हरकत देख रही थीं। अब उनकी आवाजें तीव्र हो चली थी। मैंने उसे तुरंत घोंसले में रखा।

बच्चे को घोंसले में रखकर मैं आश्वस्त हो गई थी। बच्चा अब घोंसले में सुरक्षित था। बच्चे के माता-पिता अब भी चिचिया रहे थे लेकिन ये चिचियाना पहले वाले चिचियाने से भिन्न था। वे मेरे बहुत करीब आकार चीं-चीं कर रही थीं। मैंने देखा कि  कभी मेरे सिर के पास थीं तो कभी हाथ के पास थीं। ऐसा लग रहा था मानो वे मुझे कह रही हों थैंक यू !

Monday, April 28, 2014

एक अनुभव- किराया फ्री
8 मार्च 2010 का एक अनुभव है। मैं ऑफिस जाने के लिए स्टैंड पर बस का इंतजार कर रही थी। संयोग से उस दिन महिला दिवस के साथ ही शीतलाष्टमी भी थी। बसें ज्यादा ही देरी से आ रही थी। स्टेंड पर महिला, पुरुषों की संख्या बढ़ने लगी थी। महिलाएँ रंग-बिरंगी कपड़ों में सजी-धजी थीं। मेले में जाने की तैयारी थी। एक आदमी ने मुझसे बस के बारे में पूछा और जैसे याद दिलाते हुए पक्का करते हुए कहने लगा- “आज तो महिला दिवस है तो महिलाएँ किराया नहीं देगी, फ्री में ही जाएंगी।” एक आदमी ने बहुत ही जल्दीबाजी में टिप्पणी की - “बेशरम होवली वा ही डोलबा जावली और ज्यांका मोट्यार न हो, वे जावली” (जो औरते बेशर्म होगी और जिनके पति न हो वो ही बाहर जाएंगी।) उसकी  बात सुनकर बहुत अटपटा लगा, मैं सोच ही रही थी कि उसकी बात का क्या जवाब दिया जाए, तब तक एक महिला बोल ही पड़ी – “पहल्यां किरायों लागतो जद कांईं लुगाया को न जाव छी कांई ?” (जब किराया लगता था तब महिलाएँ बाहर नहीं जाती थी क्या?) महिला मेरी तरफ देखने लगी शायद इस आशय से कि मैं भी कुछ बोलूँ। मुझे लगा जब घूँघट में रहकर अपने आत्मसम्मान के लिए बोल सकती है तो मैं क्यों नहीं? मैंने उस व्यक्ति से बस इतना ही कहा – “भाईसाहब आप क्या कहना चाहते हो औरतों को घर में ही रहना चाहिए बाहर नहीं जाना चाहिए?
अब तो उस महिला को बोलने के लिए जैसे और ताकत मिल गई हो। उसने और तेज आवाज में कहना शुरू किया – “भाया जी पढ्या- लिख्या छो या कोन्या, मुंडा स सोच समझकर तो बोलता, थाकी लुगाया न तो पर्दा में ही राखता दिखो। पर्दा में रहबाली ज्यादा खसम कर छे”। (भैया जी, पढ़े-लिखे हो या नहीं। बोलने से पहले सोच तो लो, तुम्हारी घर की औरतों को तो पर्दे में ही रखते होंगे। पर्दे में रहने वाली ज्यादा गड़बड़ियाँ करती है।) वह महिला जैसे मुझसे गवाही दिलाना चाहती हो, मेरी तरफ देखते हुए बोली – “क्यों जी असी बात छ की कोनी”? (क्यों ऐसी बात है या नहीं) मैं कुछ कहती उससे पहले ही वह आदमी अपनी सफाई देते हुए बोला – “माखी घरवाल्या ने तो टेम ही को न मिले वे तो चार बज्या ही लावणी करबा चली जाव छ।” ( मेरी पत्नी को तो टाईम ही नहीं है, सुबह चार बजे ही खेत में काम (लावणी) करने चली जाती है। उसकी बात सुनकर चुप नहीं रहा गया, मैंने कहा- “तो आप के हिसाब से औरतों को तो घर के काम में ही लगे रहना चाहिए, क्या उनकी इच्छा बाहर जाने की नहीं होती।  लावणी में तो आप भी साथ दे सकते हो, यहाँ बस स्टैंड पर गप्पे हाँकने में टाईम खराब क्यों कर रहे हो।“ अब तो आस-पास खड़े आदमी भी उस औरत का पक्ष लेकर उसे खरी-खोटी सुनाने लगे। उस आदमी की अब बोलती बंद थी। वह ज्यादा देर वहाँ खड़े रहने की हिम्मत नहीं कर पाया और वहाँ से चला गया।
उस आदमी के मुड़ते ही बस आ गई। सब बस की और दौड़े और अपनी सीट रोकने में व्यस्त हो गए।


Thursday, January 9, 2014

प्रोजेक्ट वर्क

प्रोजेक्ट वर्क
केजीबीवी में जब भी लड़कियों के बीच जाते है तो महसूस होता है कि उन्हें  बातें करके बहुत अच्छा लगता है। बातों के जरिये ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेना चाहती है। नई-नई जानकारी लेकर अपने ज्ञान का दायरा बढ़ा लेना चाहती है। उनके सवाल-जवाब शुरू होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। जैसे-जैसे उनके सवालों के जवाब मिलने लगते है तब उनका उत्साह और खुशी दुगुनी हो जाती है। नज़दीकियाँ और बढ़ जाती है। झिझक जैसी कोई चीज नजर नहीं आती है। 
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से हम भी तो यही चाहते है कि लड़कियां ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करें, खोजे और खुशी से सीखें। प्रोजेक्ट वर्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कड़ी है। यह   विषयों का दायरा तो बढ़ाता ही है साथ ही समझने, सीखने के नए आयाम उपलब्ध करवाता है।
शिक्षा का उद्देश्य यही है लड़कियों के व्यक्तित्व का विकास हो, मिलकर काम करें, अपने आप से खोजना सीखें, विषय को अन्य विषयों से जोड़े, आत्मविश्वासी बने संभवतः यह सभी गुण प्रोजेक्ट वर्क करने के दौरान उभरते है। लड़कियाँ खुशी के साथ सीखने की प्रक्रिया में लगी ही रहती है साथ ही टीचर को भी नई चीजे जानने, पढ़ने का व लड़कियों के और करीब जाने का एक और मौका हाथ में होता है।
हम सभी अपनी-अपनी संस्कृति के साथ पले-बढ़े है। जब भी अन्य राज्यों के लोगों से मिलने का मौका मिलता है उनकी संस्कृतियों को भी पहचानने लगते है। खान-पान, रहन-सहन को स्वीकार ने लगते है। हमारी संस्कृति की पहचान का एक और अहम हिस्सा है- नृत्य। लोक- नृत्य हमारी संस्कृति की पहचान है। प्रत्येक प्रांत के अपने लोकनृत्य होते हैं लेकिन अब लोक नृत्य प्रांतो के दायरे में रुके हुए नहीं है दूसरे प्रान्तों तक तक फैलने लगे है। एक प्रांत दूसरे प्रांत के लोक नृत्य को अपना रहे है या यूं कहे कि दूरियाँ कम होने लगी है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। गरबा, भांगड़ा इसका सबसे बड़ा उदारहण है।

पाठ्यक्रम में हमारी संस्कृति को बड़े पैमाने पर शामिल किया गया है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सबसे खास होते है डांस यानि नृत्य। केजीबीवी में लड़कियों की झिझक भी कुछ हद तक डांस करने के दौरान दूर होती है। डांस में लड़कियों की बहुत रुचि होती है। यदि डांस प्रोजेक्ट वर्क पर काम किया जाए तो इसको करने प्रक्रिया की यात्रा भी कम रोचक नहीं होगी।        

Wednesday, November 9, 2011

क्या हो गया है आदमी को ...?

मानव जीवन में ऐसी घटनाएँ घटती रहती रहती हैं जिसकी कोई कल्पना भी नही कर सकता  | कुछ काम आदमी ऐसे करता हैं  जिसके अंजाम के बारे में सोचता ही नहीं | मेरे अठी की बठी की ब्लॉग में  इस बार  मानव रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली  घटना का जिक्र है | ये घटना है गुजरात के (राजकोट) देवगाम की । यहां सगे मामा को उसकी पत्नी ने 12 वर्षीय भांजी का पाशविक बलात्कार करते हुए रंगे हाथों पकड़ा ।
 महिला तारीफ के काबिल है जिसने पति परमेश्वर को ही सब कुछ नहीं माना और न्याय का साथ दिया | उसने अपने पति की भांजी का साथ दिया | इज्जत की खातिर बात को दबाया नहीं |
 
पत्नी ने इस कृत्य के लिए पति को माफ नहीं किया बल्कि उसने यह बात पूरे गांव और फिर पुलिस को बताई । मामी को भांजी ने बताया कि मामा उसके साथ पांच-पांच बार बलात्कार करता था। पुलिस के सामने रोती हुई पत्नी के बस यही शब्द थे..‘साहब, पकड़ लीजिए इसको, भांजी के साथ हवस का गंदा खेल खेलता रहा यह पिशाच।’

 
रमेश मेलाभाई राठौड़ (35) नामक यह शख्स मूल वडोदरा का है, जो पिछले कुछ सालों से देवगाम में पत्नी के साथ रह रहा था। रमेश व उसकी पत्नी धर्मिष्ठा रमेश की बहन से उसकी 3 वर्षीय बच्ची अपने पास ले आए और उसके पढ़ाने-लिखाने से लेकर हरेक जिम्मेदारी पूरी करने का बहन से वादा किया था।

 
इस घर में धर्मिष्ठा ने बच्ची को अपनी बेटी की ही तरह पाला तो बच्ची के लिए भी यह घर उसका बन गया। लेकिन धीरे-धीरे बच्ची की उम्र बढ़ती गई और अब वह 12 वर्ष की हो चुकी थी। इसी बीच रमेश की गंदी नजर उस पर पड़ी । कुछ दिन पहले पत्नी की अनुपस्थिति में हवस में अंधे हो चुके रमेश ने उससे  बलात्कार किया |

 
यह कृत्य करने से पहले और बाद में भी रमेश ने यह नहीं सोचा कि फूल सी वह बच्ची उसकी सगी भांजी है। मासूम बच्ची, जो अपने मामा को पिता मानती थी, कुछ समझ न सकी बस उसके मन में अब अगर कुछ था तो सिर्फ खौफ। मामा ने भांजी को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उसे धमकी भी दे दी कि वह यह बात किसी को न बताए, नहीं तो वह उसे जान से मार देगा।

 
डर से थरथराती बच्ची यह बात अपनी मामी से भी कह न सकी। लेकिन उस पर जुल्म और यातना की अब शुरुआत हो चुकी थी। इसके बाद बलात्कार का कृत्य नित्यक्रम बन गया। मामा प्रतिदिन बच्ची के शरीर को नोंचने की फिराक में रहने लगा। किसी-किसी दिन तो उसने बच्ची के साथ पांच-पांच बार बलात्कार किया।

 
जो बच्ची दिन भर घर और बाहर दौड़ती-भागती मस्ती करती रहती थी, लेकिन अब वह मानसिक व शारीरिक रूप से इतनी टूट चुकी थी कि हर समय डरी-सहमी सी रहती थी। दो दिन पहले भी रमेश अपनी हवस की भूख मिटाने बच्ची को खेत में ले गया जहां भूसे के ढेर के पीछे उसने बच्ची का बलात्कार किया। लेकिन उसकी सिसकती हुई आवाज धर्मिष्ठा (मामी) ने सुन ली और वह दौड़ी हुई यहां आ पहुंची। बच्ची और मामा नग्न अवस्था में थे। बच्ची, मामी को देखते ही उससे लिपटकर सहम गई।

 
यह देख धर्मिष्ठा के पैरों से जमीन ही खिसक गई, वह बच्ची को लेकर सीधे गांववालों के पास पहुंच गई और पूरी घटना उन्हें बताई। गांववालों ने रमेश को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। इसके साथ ही पत्नी धर्मिष्ठा ने पुलिस को भी यह सारी बात बता दी। पुलिस के सामने रोती हुई पत्नी के बस यही शब्द थे..‘साहब, पकड़ लीजिए इसको, भांजी के साथ हवस का गंदा खेल खेलता रहा यह पिशाच।’ बच्ची के अनुसार मामा पिछले 6-7 दिनों से उसका बलात्कार कर रहा था।
ऐसी घटनाएँ रोज घटती है लेकिन कुछ ही सब के सामने आ पाती है | ये केवल न्यूज मात्र नहीं है ये हमें अहसास करवा रही है कि समाज के कुछ लोगों की गन्दी हरकतों के कारण  समाज गर्त में जा रहा है | हम किसी पर विश्वास नहीं करें, क्या वो समय आ गया है ? सोचिए ??? 

Sunday, October 9, 2011

क्या डायन होती है |

हमारे संविधान में महिलाओं को पूरा सम्मान देने की बात कही गयी है लेकिन अफ़सोस की  बात है कि संविधान में जो बातें लिखी गयी है वो बातें आजादी के चौसठ साल बाद भी उन लोगो तक नहीं पहुंची है जो महिलाओं को अब भी इंसान नहीं समझते | कई महिलाओं के साथ आज भी जानवरों जैसा बर्ताव होता रहता है| वे जानवर की तरह मूक रहकर सारे जुल्म सहने को मजबूर है| पशु-पक्षियों की रक्षा के लिए तो मेनका गाँधी डटकर सामने खड़ी हो गयी है| आम आदमी उन्हें सताने से पहले शायद मेनका जी को याद कर लेता होगा या उसे याद दिला दिया जाता होगा |
ऐसा नहीं है कि महिलाओं के लिए कुछ नहीं किया गया हैं | महिलाओं के आत्मसम्मान के लिए बहुत सारे कानून भी बने हैं | सभी धर्मों,धर्म ग्रंथो मे भी अपने-अपने तरीके से सम्मान देने की बात कही गयी है | लेकिन क्या महिलाएं अत्याचारों से मुक्त हो पाई ?
महिलाओं को ससुराल पक्ष द्वारा कभी दहेज के नाम पर जहर पिलाया जाता है,धमकाया जाता है, जलाया जाता है या फांसी दे दी जाती है | कभी भूत-प्रेत निकालने के नाम पर उसे गर्म चिमटों से दागा जाता है और कभी डायन कहकर मार-पीट करके प्रताड़ित किया जाता है | घरेलू हिंसा तो इनके खाते मे बोनस के रूप में अधिकार की तरह मिली हुई है|
किसी महिला के साथ कोई घटना घटती है या तो उसे गाँव की इज्जत कह कर वहीँ दबा दिया जाता है | यदि किसी तरह घटना सबको पता चल जाती है तो आरोपी किसी तरह छूटने का प्रयास करता है रुपया-पैसा देकर छूट भी जाता है| पीड़ित को धमकियां देना तो आम बात है| किसी तरह मिडिया तक बात पहुँच जाती है तो वो कर्तव्य निभाते हुए एक-दो बार न्यूज में जिक्र करते है | यदि किसी संगठन ने घटना को हाथों-हाथ लिया तो सुर्खियाँ बन जाती है नहीं तो पीड़ित महिला अपनी किस्मत को कोसती जिन्दगी भर महिला होने का बोझ ढोती रहती है|  
        मुझे तो भारत की दो तस्वीरे साफ दिखाई देती है | एक तरफ कुछ महिलाएं शिक्षा रूपी हवाईजहाज पर बैठकर अंतरिक्ष की यात्रा करते हुए चाँद पर पहुँच कर अन्य महिलाओं को वहाँ पहुँचने के लिए प्रेरित कर रही है तो दूसरी तस्वीर इतनी भयानक है कि कोई कोई सपने मे भी इसको नहीं देखना चाहता | कहने को तो हम इक्कीसवीं सदी मे चल रहे है लेकिन डायन जैसी घटनाएँ देखते है तो लगता है जितने हम आगे चले थे उतने ही पीछे पहुँच रहे है | मैं जिस घटना का जिक्र कर रही हूँ उसे देख-सुन कर ही रोंगटे खड़े हो जाते है | जिसके साथ ये  क्रूरतम व्यवहार हुआ है उसकी व्यथा की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते |        
एक न्यूज को मैं ज्यों का त्यों ही दे रही हूँ | आप ही सोचिये क्या ऐसी घटना अपने साथ घटने  की कल्पना मात्र से ही रूह नहीं कांप जायेगी ...............

सुपौल :   भपटियाही थाना क्षेत्र के झिल्ला-डुमरी गांव में  दशहरा के दिन राधा देवी (30) नामक महिला की पड़ोस के ही कुछ लोगों ने डायन बताकर  जमकर पिटाई की और उसे मैला घोलकर पिला दिया।

घटना के वक्त पीडि़ता अपने चार मासूम बच्चों के साथ मंदिर मे मां दुर्गा के  दर्शन करने जा रही थी। घटना को लेकर पुलिस ने पीडि़ता के बयान पर आधा दर्जन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली है । पीडि़ता का इलाज भपटियाही अस्पताल में चल रहा है।

क्या है मामला:

पीडि़ता राधा देवी के पति हरिनारायण मुखिया ने बताया कि उनके पड़ोस में रहने वाले उपेन्द्र मुखिया की भैंस ने दूध देना बंद कर दिया था। उसको लेकर उपेन्द्र, रामचन्द्र, सुलेखा देवी एवं उसके परिवार के अन्य सदस्य उसे डायन कहने लगे। वे लोग भैंस का दूध वापस लाने को कह रहे थे। इसी को लेकर बार-बार मारने पर उतारू थे।

पीडि़ता ने बताया कि उसका पति विकलांग है और अभी पंजाब में है। बुधवार के 4 बजे संध्या में वह अपने चारों बच्चे को ले मां भगवती का दर्शन करने जा रही थी। सड़क पर पहुंचते ही आरोपियों ने उसे घेर लिया। उसकी बुरी तरह पिटाई की और मैला घोलकर जबरन पिला दिया।

उसके बाद वे लोग बच्चों के साथ भी मारपीट करने लगे। बेहोशी की  हालत में कुछ लोगों ने उसे नहलाया और थाना तक ले गए । पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करने के बाद जैसे ही पीडि़ता घर पहुंची कि आरोपी ने फिर उसे एवं उसके बच्चे का पिटाई की।

शुक्रवार के सबेरे थानाध्यक्ष सुनील कुमार स्थल पर पहुंचे। महिला की हालत देख उसे तत्काल इलाज हेतु भपटियाही अस्पताल में भर्ती कराया। फिलहाल पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है जबकि पीडि़ता का अस्पताल में इलाज चल रहा है ।
अक्सर देखा गया है कि ऐसी घटनाएँ उन महिलाओं के साथ घटती है जो अकेली रहती है या विधवा है या जिसके पास जमीन-जायदाद है या जिसका पति विकलांग है | महिलाएं कब तक अग्नि परीक्षा देती रहेगीं ? क्या कभी परीक्षा मे पास हो पाएंगी ? क्या कभी ऐसा समाज बन पायेगा जिसमें महिलाओं को चेन से जीने दिया जाये ?

Saturday, June 18, 2011

फादर्स डे

आज फादर्स डे है | आज अभी अपने-अपने तरीके से इसे सेलिब्रेटकर कर रहे है | आज की व्यस्तता भरी जिन्दगी में रिश्ते भी व्यस्त हो गए है रिश्तों के बिना रहना भी मुश्किल है | एक-एक दिन सभी रिश्तों को देना उन्हें याद करना सेलिब्रेट करना बहुत ही अच्छा विचार है |  आज के समाचार पत्र में दो समाचार पढ़े | फादर्स -डे  और बेटी को सीने से लगा कर मार दी गोली ! इससे चार दिन पहले वह अपनी पत्नी और एक बेटी को भी मार चूका था | गोली क्यों मारी ?  वजह चाहे जो रही हो | लेकिन उस पिता के बारे में सोचने पर एक बात तो समझ में आती है कि वो अपनी बेटियों को चाहता बहुत था | पिता शायद अपनी जिन्दगी से इतना हतास हो गया था कि उसे ये जिंदगी छोड़ना ही बेहतर लगा | मोत के बाद बेटियों का क्या होगा | बेटियों को बाद में कोई तकलीफ न हो इसलिए उनको भी साथ ले जाने का विचार बनाया | शायद न भी बनाया हो हालत ही ऐसे हो गए हो तब ही तो दूसरी बेटी को चार दिन बाद में अपने सीने से लगा कर ले गया | उसकी उस समय कि मन स्थिति समझ पाना मुश्किल है | पिता होने के नाते उसने अपनी बेटियों के भविष्य के लिए सपने भी पाल रखे होंगे | जब जिन्दगी में चुनैतियां ने पाँव पसारे तो उसका सामना नही कर सका यहाँ तक की उसने अपने परिवार में भी उस पर बात नही की अ हो सकता था उसका कोई हल निकल जाता लेकिन आज-कल लोगो ने आपस में संवाद करना बंद कर दिया है | आज कल सब अपने आप में सिमट गए | सुनने-सुनाने का समय किसी के पास नही है कोई होसला करके किसी को कुछ कहना भी चाहे तो गंभीरता से कोई सुनता नही है और शायद ये भी खा जाता है ये अपना दुखड़ा दूसरों के सामने रोता है |   लेकिन इस पिता ने अपने पिता के बारे में नही सोचा उनके दिल पर क्या गुरेगी उसके पिता एक अनुभवी जिन्दगी जी चुके है उनके पास उसकी समस्याओ का हल जरुर होता यदि वो उन्हें बताता तो | एक पिता दूसरे पिता को दुःख पंहुचा कर इस दुनिया से चला गया |