एक अनुभव- किराया फ्री
8 मार्च 2010 का एक अनुभव है। मैं
ऑफिस जाने के लिए स्टैंड पर बस का इंतजार कर रही थी। संयोग से उस दिन महिला दिवस
के साथ ही शीतलाष्टमी भी थी। बसें ज्यादा ही देरी से आ रही थी। स्टेंड पर महिला,
पुरुषों की संख्या बढ़ने लगी थी। महिलाएँ रंग-बिरंगी कपड़ों में सजी-धजी थीं। मेले
में जाने की तैयारी थी। एक आदमी ने मुझसे बस के बारे में पूछा और जैसे याद दिलाते
हुए पक्का करते हुए कहने लगा- “आज तो महिला दिवस है तो महिलाएँ किराया नहीं देगी, फ्री
में ही जाएंगी।” एक आदमी ने बहुत ही जल्दीबाजी में टिप्पणी की - “बेशरम होवली वा
ही डोलबा जावली और ज्यांका मोट्यार न हो, वे जावली” (जो औरते बेशर्म होगी
और जिनके पति न हो वो ही बाहर जाएंगी।) उसकी
बात सुनकर बहुत अटपटा लगा, मैं सोच ही रही थी कि उसकी बात का क्या जवाब दिया जाए, तब
तक एक महिला बोल ही पड़ी – “पहल्यां किरायों लागतो जद कांईं लुगाया को न जाव छी
कांई ?” (जब किराया लगता था तब महिलाएँ बाहर नहीं जाती थी क्या?)
महिला मेरी तरफ देखने लगी शायद इस आशय से कि मैं भी कुछ बोलूँ। मुझे लगा जब घूँघट
में रहकर अपने आत्मसम्मान के लिए बोल सकती है तो मैं क्यों नहीं?
मैंने उस व्यक्ति से बस इतना ही कहा – “भाईसाहब आप क्या कहना चाहते हो औरतों को घर
में ही रहना चाहिए बाहर नहीं जाना चाहिए?“
अब तो उस महिला को बोलने के लिए जैसे
और ताकत मिल गई हो। उसने और तेज आवाज में कहना शुरू किया – “भाया जी पढ्या- लिख्या
छो या कोन्या, मुंडा स सोच समझकर तो बोलता, थाकी लुगाया न
तो पर्दा में ही राखता दिखो। पर्दा में रहबाली ज्यादा खसम कर छे”। (भैया जी,
पढ़े-लिखे हो या नहीं। बोलने से पहले सोच तो लो, तुम्हारी घर की औरतों
को तो पर्दे में ही रखते होंगे। पर्दे में रहने वाली ज्यादा गड़बड़ियाँ करती है।) वह
महिला जैसे मुझसे गवाही दिलाना चाहती हो, मेरी तरफ देखते हुए बोली – “क्यों
जी असी बात छ की कोनी”? (क्यों ऐसी बात है या नहीं) मैं कुछ कहती उससे पहले
ही वह आदमी अपनी सफाई देते हुए बोला – “माखी घरवाल्या ने तो टेम ही को न मिले वे
तो चार बज्या ही लावणी करबा चली जाव छ।” ( मेरी पत्नी को तो टाईम ही नहीं है,
सुबह चार बजे ही खेत में काम (लावणी) करने चली जाती है। उसकी बात सुनकर चुप नहीं
रहा गया, मैंने कहा- “तो आप के हिसाब से औरतों को तो घर के काम में
ही लगे रहना चाहिए, क्या उनकी इच्छा बाहर जाने की नहीं होती। लावणी में तो आप भी साथ दे सकते हो,
यहाँ बस स्टैंड पर गप्पे हाँकने में टाईम खराब क्यों कर रहे हो।“ अब तो आस-पास खड़े
आदमी भी उस औरत का पक्ष लेकर उसे खरी-खोटी सुनाने लगे। उस आदमी की अब बोलती बंद
थी। वह ज्यादा देर वहाँ खड़े रहने की हिम्मत नहीं कर पाया और वहाँ से चला गया।
उस आदमी के मुड़ते ही बस आ गई। सब
बस की और दौड़े और अपनी सीट रोकने में व्यस्त हो गए।
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