एक दिन ऑफिस के साथियों के साथ उदयपुर के एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गए | टिप देने की परम्परा न जाने कब से हमारे समाज में चल रही है, वो परम्परा हमने भी निभाई लेकिन टिप देना चाहिए या नहीं देनी चाहिए पर हमारी अच्छी-खासी बहस छिड़ गयी | तब उस बात का कोई निचोड़ नहीं निकला | लेकिन ये प्रश्न तो बनता है कि हम वेटर को टिप क्यों देते है | वेटर को अच्छा-खासा वेतन मिलता है फिर हम उन्हें टिप क्यों देते हैं | दो-तीन बातें तो है एक तो जिन के पास पैसा हैं वो अपनी शान समझते हैं और दूसरे वो है जो उन बड़े लोगों कि परम्परा को निभाने को बाध्य होते हैं नहीं चाहते हुए भी टिप देते हैं वो ये दिखाना नहीं चाहते हैं की हम इस हैसियत में नहीं हैं | युवा वर्ग जब ग्रुप में जाते हैं तो अपनी धोंश जमाने के लिए टिप नही देते हैं | देने-नहीं देने के सबके पास अपने-अपने तर्क हैं | लेकिन प्रश्न तो अपनी ही जगह है टिप दे या न दें | तर्क यह दिया जाता है कि वेटर हमारी खातिरदारी करता हैं तब यहाँ एक प्रश्न बनता है कि हम उन ट्रेफिक पुलिस को टिप क्यों नहीं देते जो दिनभर सड़क पर खड़ा होकर ट्रेफिक को कंट्रोल करता है और नियम पर चलने के लिए मदद करता है, तब तो हम पचास का नोट निकालकर उसे नहीं देते | अरे भाई ड्यूटी तो वो भी कर रहा है फिर उसका टिप पर अधिकार नहीं बनता क्या | ढाबे पर खाना खाने जाते है तब वह काम कर रहे बच्चे को तो हम रूपये निकालकर नहीं देते कि सुबह से काम में लग रहा है अब हमारी खातिरदारी कर रहा है और भी बहुत जगह हम देख सकते है जहाँ टिप तो बनती है लेकिन उस को ड्यूटी में गिना देते हैं | टिप पर हक तो केवल वेटर और गेट पर खड़े होने वाले दरबान का ही बनता है | मैं तो इस सवाल में उलझी हूँ आपके पास जवाब हो तो जरुर बताएँ |
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Saturday, May 28, 2011
Friday, May 27, 2011
ये मेरी शुरुआत है
हमारे आस-पास ऐसी बहुत सारी बातें होती है जिससे हम बेखबर रहते है,या तो हमारे पास काम बहुत होते है या हम अपने-आप तक सीमित होते है | जब हमें समाचार जगत से पता चलता है तो हम आश्चर्य करते है | तब उन ख़बरों को बहुत चाव से पढ़ते हैं और टीवी न्यूज में देखते भी है | मेरे आस-पास कुछ ऐसा घटता है तो में आपको जरुर बताउंगी |
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