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Thursday, September 24, 2020

 आज बहुत साल बाद मुझे अपने ब्लॉग की याद आई। बीते सालों में जिंदगी में इतने घटनाक्रम गुजरे हैं कि दूसरी  बातों का कुछ ख़याल ही नहीं रहा। आज याद आई तो लगा ब्लॉग ही अपना सच्चा साथी है, जहां मन की बात तो कर सकते हैं ना। इन बीते सालों ने जितना लिया है उससे ज्यादा दिया भी है। इसलिए अच्छे-बुरे दिनों की संज्ञा दी जा सकती है। 

इन सालों ने महसूस करवाया कि एक व्यक्ति का अपाहिज होना, जितना उस व्यक्ति को  तकलीफ देता है उससे कहीं ज्यादा उसके आस-पास रहने वाले व्यक्तियों को झेलना पड़ता है। अपाहिज व्यक्ति चीजों को तोड़-फोड़ कर, चिल्लाकर और दूसरों को प्रताड़ित करके अपने अंदर के गुस्से के गुब्बार को निकाल देता है।  उसके आस-पास के व्यक्तियों को ये सब करना नासमझ ही साबित करता है। 

जीवन साथी का अपाहिज होना,  गम में राहत और  सहारा देने वाली सास माँ का असमय ही दुनिया से विदा हो जाना ये दो बड़े झटके जीवन के थे। ईश्वर ने इन झटकों के बीच एक प्यारी बेटी दी और हमारी दुनिया में एक अलग ही बहार आ गई। सब गम छूमंतर हो गए। 

भले भी दिन आते जगत में बुरे भी दिन आते      

 

घोंसला

पिछले साल किचन की चिमनी खराब हो गई थी। किचन में चिमनी लगाए हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था iइसलिए सोचा कंपनी ने ही चिमनी खराब दी है। चिमनी ठीक करने के लिए एक मिस्त्री को बुलाया  उसने बताया- मोटर खराब हो गई है, बदलवानी पड़ेगी। खर्चा भी अधिक  बता रहा था। ज्यादा खर्चे के कारण  ठीक करवाने का आइडिया ड्रॉप कर दिया। कुछ दिन बाद फ्रिज ठीक करने आए मिस्त्री को लगे हाथ चिमनी भी दिखाई। उसने भी मोटर खराब बताई लेकिन उसने कहा- वह उसे ठीक कर सकता है।  उसने अपनी फीस भी कम बताई तो तुरंत उसे ठीक करने का ठेका दे दिया। उसने थोड़ा समय लगाकर आखिर  ठीक भी कर दिया। मिस्त्री ने बताया- कि चिमनी के पाइप में चिड़ियाँ ने अपना घोंसला बना लिया था। घोंसले के  तिनके मोटर में फंस गए थे। इस कारण से मोटर जाम हो गई।

दरअसल चिमनी का पाइप बालकनी की तरफ खुलता है। इस तरफ मेरा कभी ध्यान ही नहीं गया था कि चिड़िया वहाँ घोंसला भी बना सकती है।  यदि समय रहते पाइप के छेद को जाली से कवर्ड कर दिया जाता तो मोटर खराब नहीं हुई होती। समय आने पर पक्षी अपने लिए घर तो तलाशते हैं ही।  चिड़ियों  को  चिमनी का रास्ता ही सबसे अच्छी जगह लगी होगी।  तिनका-तिनका जोड़कर उन्होने अपना घर तो बना  लिया था लेकिन  मोटर तिनकों के कारण जाम हो गई थी।

पिछली बार की भाँति इस बार भी चिड़ियों ने इसी जगह को चुना। इस बार चिड़ियों के घोंसला बनाने से पहले जाली तो लगा दी थी लेकिन ठीक से नहीं लग पाई थी। पाइप के छेद का थोड़ा सा हिस्सा ढकने से रह गया था। चिड़ियों के लिए तो खुल्ला हुआ उतना सा हिस्सा ही काफी था। इस बार मैंने भी सोच लिया था कि घोंसला नहीं बनाने दूँगी।  दुबारा मोटर खराब ना हो इसलिए चिड़ियों द्वारा लाए गए तिनकों को बार-बार हटाती रही। चिड़ियों को कई बार भगाया भी। मैंने जुगत करके पाइप के छेद को ठीक से बंद करने का प्रयास किया लेकिन मुझसे ज्यादा मेहनत तो चिड़िया कर रही थीं।  चिड़ियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वे बार बार जाली से रास्ता बना ही लेती थीं। उनका घोंसला हटाना मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन मेरी भी मजबूरी थी। चिड़िया की मेहनत खराब करने से मुझे अब किसी का घर तोड़ने का सा  अपराध बोध  होने लगा था। 

नर और मादा दोनों चिड़िया दिन में कई बार तिनका लाती। जाली लगने  के कारण तिनका रखने  की जगह नहीं मिल रही थी। उनके तिनके नीचे जमीन पर ही गिर जाते। अब वे दोनों मेरी रसोई की खिड़की पर बैठकर चीं-चीं करने लगी थीं। चिड़िया के अन्य  दोस्तों ने भी उनकी ची ची में साथ देना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था।  अब वे सब मिलकर चीं-चीं की आवाज से चिड़ चिड़ाने लगे थे। ऐसा नहीं था कि पहले कभी वे साथ-साथ चीं-चीं नहीं करते थे। करते थे जब कभी दाना देने में देरी हो जाती थी तब। मुझे याद दिलाने के लिए भी सभी मिलकर चिचियाते थे। खाना खाकर चुप भी हो जाती थीं। सुबह शाम की चीं-चीं तो मैं जानती लेकिन ये बेवक्त का चिचियाना!  मैं यह भी सोचती कि चिड़ियाँ क्या गलत कर रही हैं, अपना घर ही तो बना रही हैं। रोटी के साथ मकान भी तो चाहिए। मैं उनके लिए विलेन बन रही थी। मैं ही उनका मकान नहीं बनने दे रही। मेरा मन भी बैचेन होने लगा था। कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मैं सोचने लगी यदि चिड़िया की जगह मैंने इन्सानों का घर तोड़ा होता तो शायद लड़ाई हो जाती, गालियाँ पड़ती, हो सकता है केस भी हो जाता। अब कहीं अंदर से आवाज आने लगी थी कि तुम गलत कर रही हो।

दिनभर दिमाग में एक ही बात घूमती रहती कि  चिड़ियाँ के लिए क्या करूँ? ऐसा क्या करूँ कि दोनों की समस्या हल हो जाए। चिमनी भी खराब नहीं हो और चिड़िया का घोंसला भी बन जाए। घोंसला बनने बिगड़ने के बीच ही मेरी बेटी का बर्थडे आया। बर्थडे में केक कटा। केक चिड़ियों ने भी खाया। शायद उन्होने बेटी को विश भी किया हो। केक का खाली डिब्बा फ़ैकने के लिए एक तरफ रख दिया था।  दूसरे दिन कचरे की गाड़ी में फ़ैकने के लिए डिब्बा उठाया तो सहसा एक विचार मन में आया। क्यों ना इसी को चिड़िया का घर बना दिया जाए। तुरंत मैंने डिब्बे में चिड़िया के घुसने के लिए एक गोल दरवाजा बनाया और डिब्बे रूपी घोंसले को किचन के पास ही बांध दिया। अब मैं इंतजार करने लगी कि चिड़ियों की नजर उस पर पड़े। बार-बार बाहर आकर देखती। तिनका कहाँ ले जा रही है? चिड़िया डिब्बे रूपी घर को अपनाती है या नहीं? ये देखने में ही पूरा दिन निकल जाता। घर वाले भी इस काम में लग गए थे।   

लगभग दो दिन तक चिड़ियों का वही क्रम चलता रहा। मैं अपने हाथ के इशारे से और अपनी भाषा से  उनको वहाँ जाने के लिए भी कहती लेकिन वो डर कर फुर्र से उड़ जाती। तिनका लाकर चिचियाना जारी था। तीसरे दिन मैंने देखा डिब्बे का एक हिस्सा खुला है। मैंने सोचा  हवा के कारण डिब्बा खुल गया होगा। अब चिड़ियाँ घोंसला कैसे बनाएगी?  यह देखकर मन दुखी हो गया। डिब्बे से मेरी नजर नहीं हट रही थी। सहसा मुझे डिब्बे के खुले हिस्से में कुछ घास के तिनके नजर आए। तिनके नजर आने का मतलब चिड़िया इसमें गई हैं। उन तिनकों को देखकर मुझे इतनी खुशी हुई जितनी मेरा घर बनने पर भी नहीं हुई थी। डिब्बे रूपी घर को चिड़ियों ने अपना लिया था। ऐसा लगा जैसे बहुत बड़ा बोझ मन से उतर गया हो।

दिनों-दिन तिनकों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इस दौरान ही एक दिन अचानक बरसात आ गई। मुझे घोंसले का ही खयाल आया। उसके ऊपर तो कोई दीवार ही नहीं थी। गत्ते का डिब्बा है तो पानी में तो गल ही जाएगा। घोंसले को बचाने के लिए दिमाग दौड़ाने लगी। आटे के खाली प्लास्टिक के बैग का ध्यान आया। जुगाड़ करके घोंसले के ऊपर प्लास्टिक का बैग बांध दिया। दो-चार दिन बाद तेज अंधड़ आ गया तो डिब्बा अपनी जगह से हिल गया और हवा में झूलने लगा। अब फिर घोंसले की चिंता होने लगी। मैं उसे ठीक करने के लिए गई। घोंसले के हाथ लगाते हुए शायद दोनों चिड़ियों ने मुझे देख लिया था। वे ज़ोर ज़ोर से चिचियाने लगी। मेरे अगल-बगल उड़ने लगी। मैंने जल्दी से डिब्बा ठीक किया और तुरंत वहाँ से हट गई। उनकी बैचेनी और घबराहट से मैं समझ गई घोंसले में अंडे आ गए हैं। मुझे खुशी वाली गुदगुदी होने लगी। घर में सबको यह खुशखबरी सुनाई जैसे हमारे ही घर में नने-मुन्ने आने वाले हों।

दिन बितने के साथ घोंसले में से छोटे बच्चों की चीं-चीं सुनाई देने लगी थी। अपनी चीं चीं से सुबह जल्दी जगाने का काम चिड़ियों कर ही रही थी। वे बालकनी में चीं चीं करने लगती है तो मैं समझ जाती हूँ कि उनका खाने का समय हो गया है। रोटी, चावल दलिया सभी तरह का खाना उन्हें पसंद है।  गेंहु उन्हें ज्यादा पसंद नहीं आते हैं। कई बार उनकी रोटी को कुत्ते चट भी कर जाते हैं। इसलिए वे वापस खाना लेने के लिए आवाज लगाने लगती हैं।

एक दिन घोंसले में से एक बच्चा बालकनी में आ गिरा।  शायद अपने माता-पिता के इंतजार में वह गेट तक चला आया हो और गिर पड़ा हो। वह बहुत डरा हुआ था। घोंसले से निकलकर उसने पहली बार किसी दूसरे प्राणी को देखा था। उसके छोटे-छोटे कोमल से पंख थे लेकिन उड़ नहीं सकता था। छोटी सी चोंच थी लेकिन दाना पानी अपने आप नहीं ले सकता था। यदि वह बालकनी में रहता तो उसकी जान को खतरा था। उसको पकड़ना चाहा तो फुदककर इधर उधर भागने लगा। समझ में नहीं आ रहा था कैसे उसे अपने वश में करें। अब तक चिड़िया को भी शायद मालूम चल गया था। वे खिड़की पर बैठकर चिचियाने लगी। आज उनकी आवाज कुछ अलग थी। बच्चे की सुरक्षा के कारण आदमी जात पर कैसे विश्वास कर सकती थीं। बाकी घर के लोग भी परेशान और दुखी। एक रुमाल लेकर मैं उसके पास गई। धीरे से उसे पकड़ा और रुमाल से ढका। चिड़ियाएं लगातार मेरी ये हरकत देख रही थीं। अब उनकी आवाजें तीव्र हो चली थी। मैंने उसे तुरंत घोंसले में रखा।

बच्चे को घोंसले में रखकर मैं आश्वस्त हो गई थी। बच्चा अब घोंसले में सुरक्षित था। बच्चे के माता-पिता अब भी चिचिया रहे थे लेकिन ये चिचियाना पहले वाले चिचियाने से भिन्न था। वे मेरे बहुत करीब आकार चीं-चीं कर रही थीं। मैंने देखा कि  कभी मेरे सिर के पास थीं तो कभी हाथ के पास थीं। ऐसा लग रहा था मानो वे मुझे कह रही हों थैंक यू !