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Wednesday, November 9, 2011

क्या हो गया है आदमी को ...?

मानव जीवन में ऐसी घटनाएँ घटती रहती रहती हैं जिसकी कोई कल्पना भी नही कर सकता  | कुछ काम आदमी ऐसे करता हैं  जिसके अंजाम के बारे में सोचता ही नहीं | मेरे अठी की बठी की ब्लॉग में  इस बार  मानव रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली  घटना का जिक्र है | ये घटना है गुजरात के (राजकोट) देवगाम की । यहां सगे मामा को उसकी पत्नी ने 12 वर्षीय भांजी का पाशविक बलात्कार करते हुए रंगे हाथों पकड़ा ।
 महिला तारीफ के काबिल है जिसने पति परमेश्वर को ही सब कुछ नहीं माना और न्याय का साथ दिया | उसने अपने पति की भांजी का साथ दिया | इज्जत की खातिर बात को दबाया नहीं |
 
पत्नी ने इस कृत्य के लिए पति को माफ नहीं किया बल्कि उसने यह बात पूरे गांव और फिर पुलिस को बताई । मामी को भांजी ने बताया कि मामा उसके साथ पांच-पांच बार बलात्कार करता था। पुलिस के सामने रोती हुई पत्नी के बस यही शब्द थे..‘साहब, पकड़ लीजिए इसको, भांजी के साथ हवस का गंदा खेल खेलता रहा यह पिशाच।’

 
रमेश मेलाभाई राठौड़ (35) नामक यह शख्स मूल वडोदरा का है, जो पिछले कुछ सालों से देवगाम में पत्नी के साथ रह रहा था। रमेश व उसकी पत्नी धर्मिष्ठा रमेश की बहन से उसकी 3 वर्षीय बच्ची अपने पास ले आए और उसके पढ़ाने-लिखाने से लेकर हरेक जिम्मेदारी पूरी करने का बहन से वादा किया था।

 
इस घर में धर्मिष्ठा ने बच्ची को अपनी बेटी की ही तरह पाला तो बच्ची के लिए भी यह घर उसका बन गया। लेकिन धीरे-धीरे बच्ची की उम्र बढ़ती गई और अब वह 12 वर्ष की हो चुकी थी। इसी बीच रमेश की गंदी नजर उस पर पड़ी । कुछ दिन पहले पत्नी की अनुपस्थिति में हवस में अंधे हो चुके रमेश ने उससे  बलात्कार किया |

 
यह कृत्य करने से पहले और बाद में भी रमेश ने यह नहीं सोचा कि फूल सी वह बच्ची उसकी सगी भांजी है। मासूम बच्ची, जो अपने मामा को पिता मानती थी, कुछ समझ न सकी बस उसके मन में अब अगर कुछ था तो सिर्फ खौफ। मामा ने भांजी को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उसे धमकी भी दे दी कि वह यह बात किसी को न बताए, नहीं तो वह उसे जान से मार देगा।

 
डर से थरथराती बच्ची यह बात अपनी मामी से भी कह न सकी। लेकिन उस पर जुल्म और यातना की अब शुरुआत हो चुकी थी। इसके बाद बलात्कार का कृत्य नित्यक्रम बन गया। मामा प्रतिदिन बच्ची के शरीर को नोंचने की फिराक में रहने लगा। किसी-किसी दिन तो उसने बच्ची के साथ पांच-पांच बार बलात्कार किया।

 
जो बच्ची दिन भर घर और बाहर दौड़ती-भागती मस्ती करती रहती थी, लेकिन अब वह मानसिक व शारीरिक रूप से इतनी टूट चुकी थी कि हर समय डरी-सहमी सी रहती थी। दो दिन पहले भी रमेश अपनी हवस की भूख मिटाने बच्ची को खेत में ले गया जहां भूसे के ढेर के पीछे उसने बच्ची का बलात्कार किया। लेकिन उसकी सिसकती हुई आवाज धर्मिष्ठा (मामी) ने सुन ली और वह दौड़ी हुई यहां आ पहुंची। बच्ची और मामा नग्न अवस्था में थे। बच्ची, मामी को देखते ही उससे लिपटकर सहम गई।

 
यह देख धर्मिष्ठा के पैरों से जमीन ही खिसक गई, वह बच्ची को लेकर सीधे गांववालों के पास पहुंच गई और पूरी घटना उन्हें बताई। गांववालों ने रमेश को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। इसके साथ ही पत्नी धर्मिष्ठा ने पुलिस को भी यह सारी बात बता दी। पुलिस के सामने रोती हुई पत्नी के बस यही शब्द थे..‘साहब, पकड़ लीजिए इसको, भांजी के साथ हवस का गंदा खेल खेलता रहा यह पिशाच।’ बच्ची के अनुसार मामा पिछले 6-7 दिनों से उसका बलात्कार कर रहा था।
ऐसी घटनाएँ रोज घटती है लेकिन कुछ ही सब के सामने आ पाती है | ये केवल न्यूज मात्र नहीं है ये हमें अहसास करवा रही है कि समाज के कुछ लोगों की गन्दी हरकतों के कारण  समाज गर्त में जा रहा है | हम किसी पर विश्वास नहीं करें, क्या वो समय आ गया है ? सोचिए ??? 

Sunday, October 9, 2011

क्या डायन होती है |

हमारे संविधान में महिलाओं को पूरा सम्मान देने की बात कही गयी है लेकिन अफ़सोस की  बात है कि संविधान में जो बातें लिखी गयी है वो बातें आजादी के चौसठ साल बाद भी उन लोगो तक नहीं पहुंची है जो महिलाओं को अब भी इंसान नहीं समझते | कई महिलाओं के साथ आज भी जानवरों जैसा बर्ताव होता रहता है| वे जानवर की तरह मूक रहकर सारे जुल्म सहने को मजबूर है| पशु-पक्षियों की रक्षा के लिए तो मेनका गाँधी डटकर सामने खड़ी हो गयी है| आम आदमी उन्हें सताने से पहले शायद मेनका जी को याद कर लेता होगा या उसे याद दिला दिया जाता होगा |
ऐसा नहीं है कि महिलाओं के लिए कुछ नहीं किया गया हैं | महिलाओं के आत्मसम्मान के लिए बहुत सारे कानून भी बने हैं | सभी धर्मों,धर्म ग्रंथो मे भी अपने-अपने तरीके से सम्मान देने की बात कही गयी है | लेकिन क्या महिलाएं अत्याचारों से मुक्त हो पाई ?
महिलाओं को ससुराल पक्ष द्वारा कभी दहेज के नाम पर जहर पिलाया जाता है,धमकाया जाता है, जलाया जाता है या फांसी दे दी जाती है | कभी भूत-प्रेत निकालने के नाम पर उसे गर्म चिमटों से दागा जाता है और कभी डायन कहकर मार-पीट करके प्रताड़ित किया जाता है | घरेलू हिंसा तो इनके खाते मे बोनस के रूप में अधिकार की तरह मिली हुई है|
किसी महिला के साथ कोई घटना घटती है या तो उसे गाँव की इज्जत कह कर वहीँ दबा दिया जाता है | यदि किसी तरह घटना सबको पता चल जाती है तो आरोपी किसी तरह छूटने का प्रयास करता है रुपया-पैसा देकर छूट भी जाता है| पीड़ित को धमकियां देना तो आम बात है| किसी तरह मिडिया तक बात पहुँच जाती है तो वो कर्तव्य निभाते हुए एक-दो बार न्यूज में जिक्र करते है | यदि किसी संगठन ने घटना को हाथों-हाथ लिया तो सुर्खियाँ बन जाती है नहीं तो पीड़ित महिला अपनी किस्मत को कोसती जिन्दगी भर महिला होने का बोझ ढोती रहती है|  
        मुझे तो भारत की दो तस्वीरे साफ दिखाई देती है | एक तरफ कुछ महिलाएं शिक्षा रूपी हवाईजहाज पर बैठकर अंतरिक्ष की यात्रा करते हुए चाँद पर पहुँच कर अन्य महिलाओं को वहाँ पहुँचने के लिए प्रेरित कर रही है तो दूसरी तस्वीर इतनी भयानक है कि कोई कोई सपने मे भी इसको नहीं देखना चाहता | कहने को तो हम इक्कीसवीं सदी मे चल रहे है लेकिन डायन जैसी घटनाएँ देखते है तो लगता है जितने हम आगे चले थे उतने ही पीछे पहुँच रहे है | मैं जिस घटना का जिक्र कर रही हूँ उसे देख-सुन कर ही रोंगटे खड़े हो जाते है | जिसके साथ ये  क्रूरतम व्यवहार हुआ है उसकी व्यथा की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते |        
एक न्यूज को मैं ज्यों का त्यों ही दे रही हूँ | आप ही सोचिये क्या ऐसी घटना अपने साथ घटने  की कल्पना मात्र से ही रूह नहीं कांप जायेगी ...............

सुपौल :   भपटियाही थाना क्षेत्र के झिल्ला-डुमरी गांव में  दशहरा के दिन राधा देवी (30) नामक महिला की पड़ोस के ही कुछ लोगों ने डायन बताकर  जमकर पिटाई की और उसे मैला घोलकर पिला दिया।

घटना के वक्त पीडि़ता अपने चार मासूम बच्चों के साथ मंदिर मे मां दुर्गा के  दर्शन करने जा रही थी। घटना को लेकर पुलिस ने पीडि़ता के बयान पर आधा दर्जन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली है । पीडि़ता का इलाज भपटियाही अस्पताल में चल रहा है।

क्या है मामला:

पीडि़ता राधा देवी के पति हरिनारायण मुखिया ने बताया कि उनके पड़ोस में रहने वाले उपेन्द्र मुखिया की भैंस ने दूध देना बंद कर दिया था। उसको लेकर उपेन्द्र, रामचन्द्र, सुलेखा देवी एवं उसके परिवार के अन्य सदस्य उसे डायन कहने लगे। वे लोग भैंस का दूध वापस लाने को कह रहे थे। इसी को लेकर बार-बार मारने पर उतारू थे।

पीडि़ता ने बताया कि उसका पति विकलांग है और अभी पंजाब में है। बुधवार के 4 बजे संध्या में वह अपने चारों बच्चे को ले मां भगवती का दर्शन करने जा रही थी। सड़क पर पहुंचते ही आरोपियों ने उसे घेर लिया। उसकी बुरी तरह पिटाई की और मैला घोलकर जबरन पिला दिया।

उसके बाद वे लोग बच्चों के साथ भी मारपीट करने लगे। बेहोशी की  हालत में कुछ लोगों ने उसे नहलाया और थाना तक ले गए । पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करने के बाद जैसे ही पीडि़ता घर पहुंची कि आरोपी ने फिर उसे एवं उसके बच्चे का पिटाई की।

शुक्रवार के सबेरे थानाध्यक्ष सुनील कुमार स्थल पर पहुंचे। महिला की हालत देख उसे तत्काल इलाज हेतु भपटियाही अस्पताल में भर्ती कराया। फिलहाल पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है जबकि पीडि़ता का अस्पताल में इलाज चल रहा है ।
अक्सर देखा गया है कि ऐसी घटनाएँ उन महिलाओं के साथ घटती है जो अकेली रहती है या विधवा है या जिसके पास जमीन-जायदाद है या जिसका पति विकलांग है | महिलाएं कब तक अग्नि परीक्षा देती रहेगीं ? क्या कभी परीक्षा मे पास हो पाएंगी ? क्या कभी ऐसा समाज बन पायेगा जिसमें महिलाओं को चेन से जीने दिया जाये ?

Saturday, June 18, 2011

फादर्स डे

आज फादर्स डे है | आज अभी अपने-अपने तरीके से इसे सेलिब्रेटकर कर रहे है | आज की व्यस्तता भरी जिन्दगी में रिश्ते भी व्यस्त हो गए है रिश्तों के बिना रहना भी मुश्किल है | एक-एक दिन सभी रिश्तों को देना उन्हें याद करना सेलिब्रेट करना बहुत ही अच्छा विचार है |  आज के समाचार पत्र में दो समाचार पढ़े | फादर्स -डे  और बेटी को सीने से लगा कर मार दी गोली ! इससे चार दिन पहले वह अपनी पत्नी और एक बेटी को भी मार चूका था | गोली क्यों मारी ?  वजह चाहे जो रही हो | लेकिन उस पिता के बारे में सोचने पर एक बात तो समझ में आती है कि वो अपनी बेटियों को चाहता बहुत था | पिता शायद अपनी जिन्दगी से इतना हतास हो गया था कि उसे ये जिंदगी छोड़ना ही बेहतर लगा | मोत के बाद बेटियों का क्या होगा | बेटियों को बाद में कोई तकलीफ न हो इसलिए उनको भी साथ ले जाने का विचार बनाया | शायद न भी बनाया हो हालत ही ऐसे हो गए हो तब ही तो दूसरी बेटी को चार दिन बाद में अपने सीने से लगा कर ले गया | उसकी उस समय कि मन स्थिति समझ पाना मुश्किल है | पिता होने के नाते उसने अपनी बेटियों के भविष्य के लिए सपने भी पाल रखे होंगे | जब जिन्दगी में चुनैतियां ने पाँव पसारे तो उसका सामना नही कर सका यहाँ तक की उसने अपने परिवार में भी उस पर बात नही की अ हो सकता था उसका कोई हल निकल जाता लेकिन आज-कल लोगो ने आपस में संवाद करना बंद कर दिया है | आज कल सब अपने आप में सिमट गए | सुनने-सुनाने का समय किसी के पास नही है कोई होसला करके किसी को कुछ कहना भी चाहे तो गंभीरता से कोई सुनता नही है और शायद ये भी खा जाता है ये अपना दुखड़ा दूसरों के सामने रोता है |   लेकिन इस पिता ने अपने पिता के बारे में नही सोचा उनके दिल पर क्या गुरेगी उसके पिता एक अनुभवी जिन्दगी जी चुके है उनके पास उसकी समस्याओ का हल जरुर होता यदि वो उन्हें बताता तो | एक पिता दूसरे पिता को दुःख पंहुचा कर इस दुनिया से चला गया |   

Saturday, June 11, 2011

तीस साल का सफर ?

 दैनिक भास्कर के पांच जून के अखबार में एक समाचार देखा |  छोटा-सा समाचार सेकेण्ड लास्ट पेज पर था | मुझे नही पता कितने लोगों ने इसे पढ़ा | हो सकता है किसी के नजरों में ये खबर नही भी आई हो | लेकिन इस खबर ने मुझे बहुत आहत किया | एचआईवी का सबसे पहला मामला 1981 में सामने आया  | HIV/ AIDS  के पहले व्यक्ति का पता लगा था और आज इसका पता चले पूरे 30 साल हो गए | इन 30 वर्षों में HIV/AIDS  पर काबू पाने अनेक प्रयास किये गए थे और हो भी रहे है | कई देशी-विदेशी संस्थाओं ने रात-दिन एक करके लोगों को समझाने का प्रयास किया कि ये कोई छूत की  बीमारी नहीं है, ये कैसे-कैसे होती है और इससे कैसे बचा जा सकता है, का उपाय बताया जाने लगा  | लोगों को एड्स से बचाने के लिए कम्पनियों ने कंडोम का खुलकर प्रचार किया | जगह-जगह कण्डोम के पोस्टर, सेमिनार ,ट्रेनिंग, टीवी में विज्ञापन ! क्या-क्या नहीं किया गया | इसका असर तो होना ही था | कण्डोम तो खूब बीके और बिक रहे है लेकिन नही रुका तो एड्स | हमारे बहुत से डाक्टर जो बीमारी से परिचित है वो भी इन मरीजों का इलाज करने से डरते है |
 1981 में जहाँ एक रोगी व्यक्ति सामने आया था आज वो संख्या कई लाखों में पहुंच गयी है | पूरी दुनिया में  66 लाख एचआईवी संक्रमित हैं और इसके अनुसार एड्स वालो की संख्या का पता कर सकते है |
यदि कोई व्यक्ति एचआईवी संक्रमित किसी कारण से हो, चाहे वो यौन सम्बन्धों से हो या संक्रमित रक्त चढ़ाने से | लेकिन समय रहते रोगी को सही इलाज और लोगों से जीने का हौसला मिल जाये तो काफी लम्बे समय तक वो एड्स का शिकार नही हो सकता | संक्रमित व्यक्ति भी आम जिंदगी जी सकता है | लेकिन मैं जिस खबर की बात कर रही हूँ वो देखने और सुनने में तो आत्महत्या नजर आती है लेकिन इस पर सिरे से सोचा जाये तो ये हत्या लगेगी |
ये घटना इस प्रकार है –गुजरात के खडसलिया गाँव में तीन सगी बहनों ने खुदकुशी कर ली | ये तीनों संक्रामक रोग एचआईवी से पीड़ित बताई जा रही है | जहर पीकर रेखा (12), दक्षा (10) और कृष्णा (16) ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली | दो साल पहले इसी परिवार के दो सदस्यों ने इसी तरह खुदकुशी कर ली थी | छह सदस्यों वाले इस परिवार के मुखिया विष्णुभा गोहिल (42) भी संक्रमित है | कहा जा रहा है कि रोग की चपेट में सबसे पहले माँ आई थी इसके बाद गाँव वालों ने परिवार का बहिष्कार कर दिया था और परिवार गाँव के बाहरी हिस्से में झोपड़ी बनाकर रह रहा था |
इस घटना से ये तो पता लगता है कि लोग बीमारी के बारे में तो जान गए है लेकिन ये नही जन पाए कि उन लोगों से कैसे व्यवहार करना है | उन लड़कियाँ ने भी कुछ सपने देखे होंगे , उनके कुछ अरमान होंगे लेकिन इतनी-सी आयु में उन्होंने बहुत कुछ देख और सुन लिया | उन्हें मरने के लिए मजबूर होना पड़ा |
क्या उन गाँव वालों के विरुद्ध कोई कार्यवाही हो पायेगी ? क्या एचआईवी/एड्स से पीड़ित इसी तरह से विदा लेते रहेंगे ? वे NGO जो एचआईवी/ एड्स पर काम कर रहे है वे इन मुद्दों पर भी काम कर पायेंगे ?  

Sunday, June 5, 2011

महाठग कौन ...???

बाबा रामदेव ने एक मुहीम के तहत विदेशो में जमा काला धन देश में लाने के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने की कोशिश की | देश हित को देखते हुए बहुत से लोग भी भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हुए और बाबा के आंदोलन से जुड़ गए | जो मुद्दा बाबा ने उठाया वो सरकार को कैसे रस आ सकता था क्योंकि घूमफिर कर सरकार में बैठे लोगो का ही पैसा तो वहाँ जमा है | ये क्यों चाहेगें कि बईमानी से जमा किया गया उनका पैसा कोई और लें |
सरकार ने बाबा को समझाने की बहुत कोशिश की | खुलकर कुछ बोल नहीं पाए | बाबा के द्वारा किये जा रहे आंदोलन को खत्म करने का ऐसा रास्ता अपनाया जो पूरे देश को शर्मशार कर रहा है | पुलिस तो है ही सरकार की कठपुतली | क्या औरते,क्या बच्चें,बुजुर्ग सब को बेहरमी से मारा-पीटा गया| यहाँ तक जो योगगुरु बाबा रामदेव को भी मारने की कोशिश की गयी | इस जघन्य अपराध को सत्ता में बैठे लोग उचित ठहरा रहे है | लालूप्रसाद यादव तो यहाँ तक कह रहे है कि बाबा केवल योग सिखाएं ?लालूप्रसाद के अनुसार तो सबको इन नेताओं की तरफ से आखं मूंद लेनी चाहिए | वो देश में कुछ भी करे कोई कुछ न बोले | इन नेताओं ने देश के लोगों की ये स्तिथि कर दी है कि एक छोटे से छोटा काम करवाने के लिए पैसा देना पड़ता है नही तो आपका काम लटका ही रहेगा |
सरकार द्वारा किये गए बर्बरता पूर्ण कायर आक्रमण को कांग्रेसी और उनके साथ जुड़ी पार्टियां सही बता रही है ? पुलिस अपनी सफाई दे रही है ? दिग्विजय सिंह तो बहुत ही शातिर है उन्हें आतंकी लोग तो समाननीय नजर आते है और देश भक्त लोग उन्हें ठग लगते है | दिग्विजय को अपने दिल के तराजू में तोलकर देख लेना चाहिए कि ठग कौन है और महाठग कौन हैं
इस सरकार ने तो ऐसी हरकत की है कि देश के लोगों को इस सरकार से सत्ता ही छीन लेनी चाहिए| हमारे प्रधानमंत्री के लिए तो क्या कहे वो तो सोनिया के अहसान तले बिना वजह दबे जा रहे है | हे! प्रधानमंत्री महोदय अब तो जागो माताजी को छोड़कर और लोगो की भी सुनने की कोशिश करो ?    

Saturday, June 4, 2011

एक और आंदोलन...?

विश्व में आज ऐसा कोई नही होगा जो बाबा रामदेव को नहीं जानता | जाने भी क्यों ना, उन्होंने लोगो की सेहत को आज से कई साल पहले मुद्दा बनाया था | लोग लंबे समय तक निरोग जिंदगी जिए और पूर्ण योवन का आनंद ले इसके लिए बाबा योग आंदोलन लेकर आये थे और ये आंदोलन खूब चला..,विदेशो तक चला... और आज भी घर-घर में चल रहा है... और जब ये आंदोलन व्यक्तिगत रूप से व्यक्ति से जुड़ा है तो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहेगा | व्यक्ति का भला हो और लोग ही ना जुड़े ऐसा कैसे हो सकता है | लोगों ने बाबा को सिर आँखों पर बैठाया है | बाबा ने, लोग रोग मुक्त रहे इसके लिए दवाईयां भी बनाई है | लोगों ने भी बाबा के प्रति अपना कर्तव्य समझा और उनके दवा के बिजनेस को खूब बढ़ाया भी हैं |
चार जून से बाबा एक और आंदोलन को चलाने के लिए प्रतिबद्ध हुए है इसमे भी बहुत से लोग शामिल हुए है | इस आंदोलन का मुद्दा बहुत ही खास है... भ्रष्टाचार को खत्म करवाना | और भी मुद्दे है जैसे- विदेशी बैंको में जमा लाखों करोड़ रूपये को राष्ट्रीय सम्पति घोषित कर वापस लाया जाये | काले धन को विदेशों से वापस लेन के लिए संसद से एक विधेयक पारित कराया जाये | फास्ट ट्रेक कोर्ट में भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई कर एक साल में फैसला दे दिया जाये | शिक्षा का माध्यम राष्ट्रभाषा व मातृभाषा हो | इस बार का आंदोलन बहुत ही खास है खास इस मायने में कि एक तो बाबा आंदोलन को सफल बनाने के लिए अनशन कर रहे है और दूसरा बाबा की सीधी-सीधी लड़ाई सरकार से ही है |
सरकार चाहती है कि बाबा आंदोलन न करे और आंदोलन करना ही चाहते है तो अनशन न करे | लेकिन बाबा तो ठहरे हठयोगी | एक बार सोच लिया है तो करना ही है | सरकार दोहरी होकर बाबा से हाथ जोड़कर खूब विनती कर रही है | सरकार चाहती है बातों से ही बात बन जाये लेकिन बाबा बिना कार्यवाही के अपनी जगह से नहीं हिलने वाले |
बाबा ने अनशन के लिए मंच भी शानदार बनाया है यहाँ एक पंथ तीन काज तो होंगे ही... अनशन...योगा...और राजनीति | मेरे अनुमान से एक मुद्दे को छोडकर पूरी जनता बाबा के साथ है | क्योंकि जनता को इस से सरोकार है | लेकिन कुछ लोग मेरे जैसे भी होंगे शिक्षा की बात पर सहमत नहीं होंगे | साईन्स में ऐसे शब्द है जिनका मातृभाषा में नाम हो ही नहीं सकता | ऐसा ही इंजीनियरिंग के साथ है | इसमें सब पार्ट्स विदेशी है तो भाषा भी वैसी ही होगी | कौन करेगा इन सबका ट्रांसलेट | ज्ञान के विस्तार के लिए पुस्तके तो पढ़ी ही जाती है जोकि अधिकांश इंग्लिश में है तब कैसे संभव है कि मातृभाषा में ही सब कुछ हो... इस पर तो सोचना ही होगा ?         

Saturday, May 28, 2011

टिप किसको दें...

एक दिन ऑफिस के साथियों के साथ उदयपुर के एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गए | टिप देने की परम्परा न जाने कब से हमारे समाज में चल रही है, वो परम्परा हमने भी निभाई लेकिन टिप देना चाहिए या नहीं देनी चाहिए पर हमारी अच्छी-खासी बहस छिड़ गयी | तब उस बात का कोई निचोड़ नहीं निकला | लेकिन ये प्रश्न तो बनता है कि हम वेटर को टिप क्यों देते है | वेटर को अच्छा-खासा वेतन मिलता है फिर हम उन्हें टिप क्यों देते हैं | दो-तीन बातें तो है एक तो जिन के पास पैसा हैं वो अपनी शान समझते हैं और दूसरे वो है जो उन बड़े लोगों कि परम्परा को निभाने को बाध्य होते हैं नहीं चाहते हुए भी टिप देते हैं वो ये दिखाना नहीं चाहते हैं की हम इस हैसियत में नहीं हैं | युवा वर्ग जब ग्रुप में जाते हैं तो अपनी धोंश जमाने के लिए टिप नही देते हैं | देने-नहीं देने के सबके पास अपने-अपने तर्क हैं | लेकिन प्रश्न तो अपनी ही जगह है टिप दे या न दें | तर्क यह दिया जाता है कि वेटर हमारी खातिरदारी करता हैं तब यहाँ एक प्रश्न बनता है कि हम उन ट्रेफिक पुलिस को टिप क्यों नहीं देते जो दिनभर सड़क पर खड़ा होकर ट्रेफिक को कंट्रोल करता है और नियम पर चलने के लिए मदद करता है, तब तो हम पचास का नोट निकालकर उसे नहीं देते | अरे भाई ड्यूटी तो वो भी कर रहा है फिर उसका टिप पर अधिकार नहीं बनता क्या | ढाबे पर खाना खाने जाते है तब वह काम कर रहे बच्चे को तो हम रूपये निकालकर नहीं देते कि सुबह से काम में लग रहा है अब हमारी खातिरदारी कर रहा है और भी बहुत जगह हम देख सकते है जहाँ टिप तो बनती है लेकिन उस को ड्यूटी में गिना देते हैं | टिप पर हक तो केवल वेटर और गेट पर खड़े होने वाले दरबान का ही बनता है | मैं तो इस सवाल में उलझी हूँ आपके पास जवाब हो तो जरुर बताएँ |     

Friday, May 27, 2011

ये मेरी शुरुआत है

हमारे आस-पास ऐसी बहुत सारी बातें होती है जिससे हम बेखबर रहते है,या तो हमारे पास काम बहुत होते है या हम अपने-आप तक सीमित होते है | जब हमें समाचार जगत से पता चलता है तो हम आश्चर्य करते है | तब उन ख़बरों को बहुत चाव से पढ़ते हैं और टीवी न्यूज में देखते भी है | मेरे आस-पास कुछ ऐसा घटता है तो में आपको जरुर बताउंगी |