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Monday, April 28, 2014

एक अनुभव- किराया फ्री
8 मार्च 2010 का एक अनुभव है। मैं ऑफिस जाने के लिए स्टैंड पर बस का इंतजार कर रही थी। संयोग से उस दिन महिला दिवस के साथ ही शीतलाष्टमी भी थी। बसें ज्यादा ही देरी से आ रही थी। स्टेंड पर महिला, पुरुषों की संख्या बढ़ने लगी थी। महिलाएँ रंग-बिरंगी कपड़ों में सजी-धजी थीं। मेले में जाने की तैयारी थी। एक आदमी ने मुझसे बस के बारे में पूछा और जैसे याद दिलाते हुए पक्का करते हुए कहने लगा- “आज तो महिला दिवस है तो महिलाएँ किराया नहीं देगी, फ्री में ही जाएंगी।” एक आदमी ने बहुत ही जल्दीबाजी में टिप्पणी की - “बेशरम होवली वा ही डोलबा जावली और ज्यांका मोट्यार न हो, वे जावली” (जो औरते बेशर्म होगी और जिनके पति न हो वो ही बाहर जाएंगी।) उसकी  बात सुनकर बहुत अटपटा लगा, मैं सोच ही रही थी कि उसकी बात का क्या जवाब दिया जाए, तब तक एक महिला बोल ही पड़ी – “पहल्यां किरायों लागतो जद कांईं लुगाया को न जाव छी कांई ?” (जब किराया लगता था तब महिलाएँ बाहर नहीं जाती थी क्या?) महिला मेरी तरफ देखने लगी शायद इस आशय से कि मैं भी कुछ बोलूँ। मुझे लगा जब घूँघट में रहकर अपने आत्मसम्मान के लिए बोल सकती है तो मैं क्यों नहीं? मैंने उस व्यक्ति से बस इतना ही कहा – “भाईसाहब आप क्या कहना चाहते हो औरतों को घर में ही रहना चाहिए बाहर नहीं जाना चाहिए?
अब तो उस महिला को बोलने के लिए जैसे और ताकत मिल गई हो। उसने और तेज आवाज में कहना शुरू किया – “भाया जी पढ्या- लिख्या छो या कोन्या, मुंडा स सोच समझकर तो बोलता, थाकी लुगाया न तो पर्दा में ही राखता दिखो। पर्दा में रहबाली ज्यादा खसम कर छे”। (भैया जी, पढ़े-लिखे हो या नहीं। बोलने से पहले सोच तो लो, तुम्हारी घर की औरतों को तो पर्दे में ही रखते होंगे। पर्दे में रहने वाली ज्यादा गड़बड़ियाँ करती है।) वह महिला जैसे मुझसे गवाही दिलाना चाहती हो, मेरी तरफ देखते हुए बोली – “क्यों जी असी बात छ की कोनी”? (क्यों ऐसी बात है या नहीं) मैं कुछ कहती उससे पहले ही वह आदमी अपनी सफाई देते हुए बोला – “माखी घरवाल्या ने तो टेम ही को न मिले वे तो चार बज्या ही लावणी करबा चली जाव छ।” ( मेरी पत्नी को तो टाईम ही नहीं है, सुबह चार बजे ही खेत में काम (लावणी) करने चली जाती है। उसकी बात सुनकर चुप नहीं रहा गया, मैंने कहा- “तो आप के हिसाब से औरतों को तो घर के काम में ही लगे रहना चाहिए, क्या उनकी इच्छा बाहर जाने की नहीं होती।  लावणी में तो आप भी साथ दे सकते हो, यहाँ बस स्टैंड पर गप्पे हाँकने में टाईम खराब क्यों कर रहे हो।“ अब तो आस-पास खड़े आदमी भी उस औरत का पक्ष लेकर उसे खरी-खोटी सुनाने लगे। उस आदमी की अब बोलती बंद थी। वह ज्यादा देर वहाँ खड़े रहने की हिम्मत नहीं कर पाया और वहाँ से चला गया।
उस आदमी के मुड़ते ही बस आ गई। सब बस की और दौड़े और अपनी सीट रोकने में व्यस्त हो गए।


Thursday, January 9, 2014

प्रोजेक्ट वर्क

प्रोजेक्ट वर्क
केजीबीवी में जब भी लड़कियों के बीच जाते है तो महसूस होता है कि उन्हें  बातें करके बहुत अच्छा लगता है। बातों के जरिये ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेना चाहती है। नई-नई जानकारी लेकर अपने ज्ञान का दायरा बढ़ा लेना चाहती है। उनके सवाल-जवाब शुरू होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। जैसे-जैसे उनके सवालों के जवाब मिलने लगते है तब उनका उत्साह और खुशी दुगुनी हो जाती है। नज़दीकियाँ और बढ़ जाती है। झिझक जैसी कोई चीज नजर नहीं आती है। 
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से हम भी तो यही चाहते है कि लड़कियां ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करें, खोजे और खुशी से सीखें। प्रोजेक्ट वर्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कड़ी है। यह   विषयों का दायरा तो बढ़ाता ही है साथ ही समझने, सीखने के नए आयाम उपलब्ध करवाता है।
शिक्षा का उद्देश्य यही है लड़कियों के व्यक्तित्व का विकास हो, मिलकर काम करें, अपने आप से खोजना सीखें, विषय को अन्य विषयों से जोड़े, आत्मविश्वासी बने संभवतः यह सभी गुण प्रोजेक्ट वर्क करने के दौरान उभरते है। लड़कियाँ खुशी के साथ सीखने की प्रक्रिया में लगी ही रहती है साथ ही टीचर को भी नई चीजे जानने, पढ़ने का व लड़कियों के और करीब जाने का एक और मौका हाथ में होता है।
हम सभी अपनी-अपनी संस्कृति के साथ पले-बढ़े है। जब भी अन्य राज्यों के लोगों से मिलने का मौका मिलता है उनकी संस्कृतियों को भी पहचानने लगते है। खान-पान, रहन-सहन को स्वीकार ने लगते है। हमारी संस्कृति की पहचान का एक और अहम हिस्सा है- नृत्य। लोक- नृत्य हमारी संस्कृति की पहचान है। प्रत्येक प्रांत के अपने लोकनृत्य होते हैं लेकिन अब लोक नृत्य प्रांतो के दायरे में रुके हुए नहीं है दूसरे प्रान्तों तक तक फैलने लगे है। एक प्रांत दूसरे प्रांत के लोक नृत्य को अपना रहे है या यूं कहे कि दूरियाँ कम होने लगी है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। गरबा, भांगड़ा इसका सबसे बड़ा उदारहण है।

पाठ्यक्रम में हमारी संस्कृति को बड़े पैमाने पर शामिल किया गया है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सबसे खास होते है डांस यानि नृत्य। केजीबीवी में लड़कियों की झिझक भी कुछ हद तक डांस करने के दौरान दूर होती है। डांस में लड़कियों की बहुत रुचि होती है। यदि डांस प्रोजेक्ट वर्क पर काम किया जाए तो इसको करने प्रक्रिया की यात्रा भी कम रोचक नहीं होगी।