दैनिक भास्कर के पांच जून के अखबार में एक समाचार देखा | छोटा-सा समाचार सेकेण्ड लास्ट पेज पर था | मुझे नही पता कितने लोगों ने इसे पढ़ा | हो सकता है किसी के नजरों में ये खबर नही भी आई हो | लेकिन इस खबर ने मुझे बहुत आहत किया | एचआईवी का सबसे पहला मामला 1981 में सामने आया | HIV/ AIDS के पहले व्यक्ति का पता लगा था और आज इसका पता चले पूरे 30 साल हो गए | इन 30 वर्षों में HIV/AIDS पर काबू पाने अनेक प्रयास किये गए थे और हो भी रहे है | कई देशी-विदेशी संस्थाओं ने रात-दिन एक करके लोगों को समझाने का प्रयास किया कि ये कोई छूत की बीमारी नहीं है, ये कैसे-कैसे होती है और इससे कैसे बचा जा सकता है, का उपाय बताया जाने लगा | लोगों को एड्स से बचाने के लिए कम्पनियों ने कंडोम का खुलकर प्रचार किया | जगह-जगह कण्डोम के पोस्टर, सेमिनार ,ट्रेनिंग, टीवी में विज्ञापन ! क्या-क्या नहीं किया गया | इसका असर तो होना ही था | कण्डोम तो खूब बीके और बिक रहे है लेकिन नही रुका तो एड्स | हमारे बहुत से डाक्टर जो बीमारी से परिचित है वो भी इन मरीजों का इलाज करने से डरते है |
1981 में जहाँ एक रोगी व्यक्ति सामने आया था आज वो संख्या कई लाखों में पहुंच गयी है | पूरी दुनिया में 66 लाख एचआईवी संक्रमित हैं और इसके अनुसार एड्स वालो की संख्या का पता कर सकते है |
यदि कोई व्यक्ति एचआईवी संक्रमित किसी कारण से हो, चाहे वो यौन सम्बन्धों से हो या संक्रमित रक्त चढ़ाने से | लेकिन समय रहते रोगी को सही इलाज और लोगों से जीने का हौसला मिल जाये तो काफी लम्बे समय तक वो एड्स का शिकार नही हो सकता | संक्रमित व्यक्ति भी आम जिंदगी जी सकता है | लेकिन मैं जिस खबर की बात कर रही हूँ वो देखने और सुनने में तो आत्महत्या नजर आती है लेकिन इस पर सिरे से सोचा जाये तो ये हत्या लगेगी |
ये घटना इस प्रकार है –गुजरात के खडसलिया गाँव में तीन सगी बहनों ने खुदकुशी कर ली | ये तीनों संक्रामक रोग एचआईवी से पीड़ित बताई जा रही है | जहर पीकर रेखा (12), दक्षा (10) और कृष्णा (16) ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली | दो साल पहले इसी परिवार के दो सदस्यों ने इसी तरह खुदकुशी कर ली थी | छह सदस्यों वाले इस परिवार के मुखिया विष्णुभा गोहिल (42) भी संक्रमित है | कहा जा रहा है कि रोग की चपेट में सबसे पहले माँ आई थी इसके बाद गाँव वालों ने परिवार का बहिष्कार कर दिया था और परिवार गाँव के बाहरी हिस्से में झोपड़ी बनाकर रह रहा था |
इस घटना से ये तो पता लगता है कि लोग बीमारी के बारे में तो जान गए है लेकिन ये नही जन पाए कि उन लोगों से कैसे व्यवहार करना है | उन लड़कियाँ ने भी कुछ सपने देखे होंगे , उनके कुछ अरमान होंगे लेकिन इतनी-सी आयु में उन्होंने बहुत कुछ देख और सुन लिया | उन्हें मरने के लिए मजबूर होना पड़ा |
क्या उन गाँव वालों के विरुद्ध कोई कार्यवाही हो पायेगी ? क्या एचआईवी/एड्स से पीड़ित इसी तरह से विदा लेते रहेंगे ? वे NGO जो एचआईवी/ एड्स पर काम कर रहे है वे इन मुद्दों पर भी काम कर पायेंगे ?
बस यहीं चूक हो जाती है कार्यवाही गांव वालों से पहले उन लोगों के खिलाफ हो जिन्होंने इस परिवार की जानकारी की गोपनीयता के अधिकार की रक्षा नहीं की . इसमें पहली पंक्ति में वो डॉक्टर और एं.जी.ओ. के कौंसलर आते है जिनके पास ये जानकारियाँ प्रारम्भिक रूप से से होती हैं . और फिर इनका यह दायित्व भी बनता है कि वे मरीज़ को जीवन के प्रति सकारात्मक रुख अपनाने की काउंसलिंग दे ... दरअसल दोष गांव वालों का ज्यादा नहीं है . वहाँ अज्ञान पहले ही पसरा पड़ा है. लोगों के पास अधकचर जानकारियां पहुँचती हैं . वो तो पहले ही और कई तरह की जहाल्तों में दूबे पड़े हैं . दरअसल ये मौतें उन लोगों की उपेक्षा का नतीजा है जो इस काम के लिए मोटी रकम उडा रहे हैं . आप ब्लॉग लिख रही है अपनी जिम्मेदारी समझिए बिना विश्लेषण किये भावना में सारा दोष गांव पर मत डालो . कर्यवाही के नाम पर उनसे खुली बात होनी चाहिए . दरअसल ये सामाजिक अपराध काम बल्कि मेडिकल अपराध ज्यादा है .
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